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Showing posts from August, 2026

गांव गांव और शहर शहर में, हर तरफ हरियाली हो। दुनिया का क्या मंजर होगा, चहुं ओर खुशहाली हो।।

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 गांव गांव और शहर शहर में, हर तरफ हरियाली हो। दुनिया का क्या मंजर होगा, चहुं ओर खुशहाली हो।। सड़क सुरक्षा सबकी रक्षा, यह पैगाम हमारा हो।  दुर्घटना ग्रस्तों की रक्षा , यह अभियान हमारा हो।  अनहोनी ना होने देंगे, हर घर में दिवाली हो।।  गांव गांव और शहर,,,,,,,,,,,,,,,,,  उद्योगों में काम करें तो, अंदर जब भी जाना हो।  कड़ी सुरक्षा ध्यान रखें हम, ऐसा हमने ठाना हो।  जिंदगीयां ना खोने देंगे हम, ना कहीं बदहाली हो।।  हर घर में दिवाली हो घर घर में दिवाली हो,,,,,,,, कृषि में जो काम करें वह, सावधानी का ध्यान रखें।  कशी फावड़ा और ट्रैक्टर से, सुरक्षा का भी ख्याल रखें।  इतने पेड़ लगा देंगे हम, हर घर में एक माली हो।। गांव गांव और शहर शहर में, हर तरफ हरियाली हो।  दुनिया का क्या मंजर होगा, चहुं ओर खुशहाली हो।।                                                              ...

मौत का कारोबार, दूसरों की मौत से प्यार नहीं , मौत तो हमारा स्वाद है

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 पोस्ट पूरी पढें 👇 अपनी मृत्यु..... अपनों की मृत्यु डरावनी लगती है बाकी तो मौत का उत्सव मनाता है मनुष्य...। मौत के स्वाद का चटखारे लेता मनुष्य.... थोड़ा कड़वा लिखा है पर मन का लिखा है......। मौत से प्यार नहीं , मौत तो हमारा स्वाद है। बकरे का, पाए का, तीतर का, मुर्गे का, हलाल का, बिना हलाल का, ताजा बच्चे का, भुना हुआ, छोटी मछली, बड़ी मछली, गाय का भैंस का मांस के लोथड़ों को कूच कर कबाब हल्की आंच पर सिका हुआ। न जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद हैं मौत के। क्योंकि मौत किसी और की, और स्वाद हमारा.... स्वाद से कारोबार बन गई मौत। मुर्गी पालन, मछली पालन, बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म्स। नाम "पालन" और मक़सद "हत्या"। स्लाटर हाउस तक खोल दिये। वो भी ऑफिशियल। गली गली में खुले नान वेज रेस्टॉरेंट, मौत का कारोबार नहीं तो और क्या हैं ? मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नही है। जो हमारी तरह बोल नही सकते, अभिव्यक्त नही कर सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हैं, उनकी हत्या को हमने अपना बल कैसे मान लिया ? कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होतीं ? या उनकी आहें नहीं नि...

भोपाल गैस त्रासदी की एक कहानी– किसने बचाया कुशवाह परिवार गाय और हवन की शक्ति सनातन भक्ति

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 रवि गंगवार   34 साल पहले 2-3 दिसम्बर 1984 को देश में एक भीषण त्रासदी हुई थी, जिसे भोपाल गैस कांड का नाम दिया गया। मध्य प्रदेश के भोपाल यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक जहरीली गैस का रिसाव हुआ, जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगो की जान चली गई और कई लोग शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए, जो आज भी त्रासदी की मार झेल रहे हैं। तबाही की इस काली रात में हजारों परिवारों के बीच भोपाल में कुशवाहा परिवार भी था। पेशे से एस एल कुशवाहा टीचर थे। उनके साथ उनकी पत्नी भी थी। गैस रिसाव के बाद जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया स्थितियां विस्फोटक होती गई। बच्चों की हालत भी खराब होने लगी और बाहर से रोने और शोर-शराबे की आवाजें आने लगीं। बाद में पता चला कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से गैस लीक होने लगी है।  चारों ओर से आ रही भगदड और भयावह आवाजों के बीच कुशवाहा दंपति भी डर गये। चूंकि कुशवाहा परिवार में रोज सुबह और शाम के वक्त 'अग्निहोत्र यज्ञ' होता था। इसलिए उस काली रात में भी कुशवाहा परिवार ने अग्निहोत्र यज्ञ, त्र्यंबकम होम करना जारी रखा। इसके बाद लगभग 20 मिनट के अंदर ही उनका घर ...